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Thursday, June 5, 2014

लोकतंत्र या भिड्तंत्र??

भीड़ का खौफ गहरा होता है, भीड़ का परिहास और व्यंग भी आन्दायक होता है, उस भेड़ वाली कहावत के मानिंद की एक भेड़ जिधर जाती है बाकि के भेड़ भी उसी रास्ते पर निकल पड़ते है. उन्हें पता नहीं होता मंजिल कहा है? है भी या नहीं? आखिर कोई एक भेड़ तो होगी जो सबसे आगे चलती है, क्या उसे पता नहीं होता है जिस रास्ते पर वो जा रही है उसमे अगले ही छण खाई है और सिर्फ उसका पतन नहीं होगा, उस पुरे भीड़... भेड़ के और कुछ एक निर्दोष भीड़ का भी. समय की गति है ये मान ले या ये भी मान सकते है की भीड़ पर नियंत्रण नहीं है, जैसे की महिलाओ के अत्याचार पर नियंत्रण नहीं है. अगर इन छोटे मुद्दों पर, जो बड़ी होती जा रही है, तो आपको राजा कहलाने का कोई हक नहीं है. अपने मुह मियां मिठू मत बनिए, सोचिये, कुछ इस तरह से कानून का इस्तेमाल कीजिये की पूरा जनमानस सोचने पर मजबूर हो जाये ,ये सारी बातें इतिहास की गवाह बनेगी जबतक सता में बिराजमान है तब तक कोई नहीं बोलेगा, पर उसके बाद भी बोलने वाले मिलते रहेंगे.

आज नहीं कल बोलेंगे, जिंदा रहे तो हम बोलेंगे !!!

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